Lohri katha and History : लोहड़ी क्यों मनाते हैं, जानें क्या है लोहड़ी से दुल्ला भट्टी और सुंदरी मुंदरी का संबंध
लोहड़ी का त्योहार मकर संक्रांति से एक दिन पहले मनाया जाता है, यह मुख्य रूप से सूर्य के उत्तरायण में प्रवेश का पर्व है। यह पर्व कृषि से भी जुड़ा है। लेकिन पौराणिक कथाओं में इसका संबंध लोहिता राक्षसी और श्रीकृष्ण की कथा से है। जबकि पंजाब में लोहड़ी का पर्व दुल्ला भट्टी और सुंदरी मुंदरी की कथा से जुड़ा है।

लोहड़ी का त्योहार हर साल मकर संक्रांति से एक दिन पहले मनाने की परंपरा है। ऐसी मान्यता है कि लोहड़ी का दिन सबसे ठंडा दिन होता है और यह साल का अंतिम दक्षिणायन दिन होता है और सूर्यदेव लोहड़ी के गुड़ तिल और मूंगफली खाकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं और उत्तरायण का शुभ समय आरंभ होता है। इसलिए लोहड़ी को सूर्य के उत्तरायण में प्रवेश का पर्व भी माना जाता है।

लोहड़ी पर्व कब से मनाया जा रहा है
लोहड़ी पर्व मनाने की शुरुआत कब हुई इसका कोई ठीक-ठीक प्रमाण नहीं मिलता है लेकिन ऐसी कथा मिलती है कि द्वापर युग में जब भगवान श्रीकृष्ण ने अवतार लिया था तब से लोहड़ी का पर्व मनाया जा रहा है। एक कथा मिलती है कि लोहिता नाम की एक राक्षसी थी जिसे कंस ने श्रीकृष्ण का वध करने के लिए भेजा था। गोकुल के लोग मकर संक्रांति का उत्सव मनाने की तैयारी में जुटे थे इसी मौकेका फायदा उठाकर लोहिता ने गोकुल में प्रवेश किया और श्रीकृष्ण को मारने का प्रयास किया लेकिन श्रीकृष्ण ने लोहिता का वध कर दिया। लोगों को जब लोहिता राक्षसी के वध की जानकारी मिली तो वह प्रसन्न हुए और मकर संक्रांति से पहले लोहड़ी का पर्व उत्साह पूर्वक मनाया। तब से ही मकर संक्रांति से एक दिन पहले लोहड़ी पर्व मनाने की परंपरा शुरू हुई।

लोहड़ी पर्व का कृषि से संबंध
लोहड़ी और मकर संक्रांति का पर्व एक दूसरे से जुड़ा हुआ पर्व है। इन दोनों ही पर्व का संबंध कृषि से भी है। दरअसल इस समय रबी की फसल की बुआई हो चुकी होती है और खरीफ की फसल घर में आ चुकी होती है। और किसान सूर्यदेव को प्रसन्न करना चाहते हैं कि वह उनकी कृषि को उन्नत बनाएं इसलिए मकर संक्रांति और लोहड़ी पर सूर्य के उत्तरायण होने पर और शीत ऋतु की विदाई के लिए सूर्यदेव की पूजा करते हैं और नए फसलों से पकवान बनाकर तिल, गुड़ की सामग्री बनाकर सूर्यदेव को अर्पित करते हैं। जिससे आरोग्य और सुख समृद्धि की वृद्धि बनी रहे।

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