हरिद्वार: एक तरफ जहाँ माँ गंगा को मोक्षदायिनी मानकर देश-दुनिया से श्रद्धालु यहाँ आस्था की डुबकी लगाने आते हैं, वहीं दूसरी तरफ गंगा के पावन तट आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहे हैं। संत शदाणी घाट समेत कई अन्य घाटों की वर्तमान स्थिति को देखकर यह कहना मुश्किल है कि यह कोई धार्मिक स्थल है या कचरा फेंकने का डंपिंग यार्ड।

सरकार और प्रशासन ‘नमामि गंगे’ जैसे प्रोजेक्ट्स पर करोड़ों रुपये खर्च करने के दावे तो करते हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत इन दावों से कोसों दूर है। घाटों के किनारों पर फैला प्लास्टिक, सड़ती हुई पूजा सामग्री की खाली बोतलें न केवल पर्यावरण को दूषित कर रही हैं, बल्कि श्रद्धालुओं की आस्था को भी ठेस पहुँचा रही हैं।
मुख्य समस्याएँ जो कचरे को बढ़ा रही हैं:
• प्रशासनिक अनदेखी: घाटों पर पर्याप्त डस्टबिन (कूड़ेदान) की व्यवस्था न होना और नियमित सफाई का अभाव।
• नगर निकाय की सुस्ती: कचरा उठाने वाली गाड़ियों का समय पर न पहुँचना।
• प्लास्टिक का तांडव: प्रतिबंध के बावजूद धड़ल्ले से उपयोग हो रही पॉलीथिन जो जल और तट दोनों को जहरीला बना रही है।

सवाल सिर्फ प्रशासन से ही नहीं है, सवाल हमसे और आपसे भी है। हम गंगा में आस्था तो रखते हैं, लेकिन उसे साफ रखने की जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं। खाने-पीने के पैकेट और प्लास्टिक की थैलियाँ सीधे घाट पर छोड़ देना अब एक आम आदत बन चुकी है।
“अगर इसी रफ्तार से गंदगी बढ़ती रही, तो आने वाले समय में गंगा का जल केवल तस्वीरों में ही निर्मल रह जाएगा।”
—————— हमारी माँग ————
1. प्रशासन तुरंत घाटों पर सफाई कर्मियों की संख्या बढ़ाए और रात में भी निगरानी रखी जाए।
2. गंदगी फैलाने वालों पर भारी जुर्माना लगाया जाए।
3. स्थानीय लोग और सामाजिक संस्थाएँ आगे आएं और ‘घाट स्वच्छता अभियान’ चलाएं।
संत शदाणी – घाट मेडीन प्रशासन से अपील करता है कि समय रहते जागें, इससे पहले कि ये पवित्र तट पूरी तरह कचरे के ढेर में तब्दील हो जाएं।
